Saturday, 25 April 2020

Corona Virus And Government


✍️ तहरीर : अब्बू रज़ीन मुहम्मद हारून मिस्बाही फ़तेहपूरी
🕯उस्ताज़ अलजामिअतुल अशरफिआ मुबारकपूर ,आज़मगढ़🕯
22 /मार्च 2020 ،इतवार

कोरोना वाइरस के हवाले से हकूमत-ए-हिन्द को चंद मुख़लिसाना नसीहतें


आलमी वबा कोरोना वाइरस अब हमारे मुल्क में भी पैर पसार रहा है, ख़बरों के मुताबिक़ अब ऐसे लोग भी इस के शिकार होने लगे हैं जिन्होंने हालिया अय्याम में बैरून-ए-मलिक का कोई सफ़र नहीं किया है

ऐसे हालात में हकूमत-ए-हिन्द का फ़िक्रमंद होना और इस वबा की रोक-थाम के लिए ज़रूरी तदाबीर इख़तियार करना एक फ़ित्री अमर है। हुकूमत फ़िक्रमंद भी है, अपने तौर पर मुख़्तलिफ़ तदाबीर इख़तियार भी कर रही है और इस हवाले से हिन्दुस्तानी शहरीयों में बेदारी भी ला रही है जो वाक़ई एक ख़ुश आइंद क़दम है

हमसे पहले कई ममालिक उस के शिकार हो चुके हैं और इस की रोक-थाम के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं। मज़ीद ये कि दुनिया इस तरह की वबाओं से पहले भी दो-चार हो चुकी है इसलिए हमें ये देखना चाहिए कि इस वबा के शिकार दीगर ममालिक क्या तदाबीर इख़तियार कर रहे हैं और उनकी कौन कौन सी कोशिशें कारगर साबित हो रही हैं। साथ ही इस तरह की जिन वबाओं से दुनिया पहले दो-चार हो चुकी है उन पर क़ाबू पाने के लिए क्या-क्या कोशिशें की गईं और कौन सी तदबीरें कारगर साबित हुईं उन पर नज़र करना भी ज़रूरी है ताकि उस को रोना वाइरस से निमटने के लिए उन कोशिशों और तदाबीर को ब-रू-ए-कार लाया जाये

*इस वक़्त हमारी नज़र में कुछ ऐसी तदाबीर हैं जिन्हें अगर हकूमत-ए-हिन्द अपनाती है तो इंशा-ए-अल्लाह ख़ातिर-ख़्वाह फ़ायदा नज़र आएगा, और इस वबा को रोकने में बड़ी हद तक कामयाबी हासिल होगी।*

*01:* कहते हैं कि आसमानी बुलाऐं हमारी करतूतों का नतीजा होती हैं और मज़लूमों की आह का असर। इसलिए अगर हम वाक़ई किसी आसमानी बला का ईलाज ढूंढ रहे हैं और अपनी कोशिशों में सच्चे हैं तो हमें सबसे पहले अपने आमाल का जायज़ा लेना चाहिए और उन मज़लूमीन तक पहुंचना चाहिए जिन पर हमारे हाथों या हमारी कोताहियों की वजह से ज़्यादती हुई है और उनसे अपनी ग़लतीयों और कोताहियों की माफ़ी मांगनी चाहिए, उन पर की गई ज़्यादतियों का मुदावा करना चाहिए, उनके आँसू पोंछना चाहिए, उनको ख़ुश करना चाहिए और उनकी ज़रूरतें पूरी करनी चाहिऐं ताकि उनकी आह के ज़ेर-ए-असर जो बला आई है वो उनकी ख़ुशी के कलिमात से दूर हो सके

*मौजूदा हुकूमत को चाहिए कि इस के दौर में होने वाले मुख़्तलिफ़ किस्म के फ़सादाद में ज़ुलम-ओ-ज़्यादती के शिकार लोगों, घरानों और ख़ानदानों को तलाश करे और फ़ौरी तौर पर उनसे माफ़ी मांगे, उनकी ज़रूरत की चीज़ें उन्हें मुहय्या करे और उनके लिए एक बेहतर और ख़ुश-हाल ज़िंदगी का इंतिज़ाम करे। खासतौर से दिल्ली फ़साद मुतास्सिरीन की मदद करे और उनके रहने और खाने का इंतिज़ाम करे, जेलों में बंद बेक़सूर लोगों को फोरा रिहा करे।*

*02:* मुल्क के ग़रीब तबक़े पर अपनी तवज्जा मर्कूज़ करे, मज़दूरी करने वालों पर ख़ास तवज्जा दे और जब तक काम काज बंद रहे उनके खाने पीने का इंतिज़ाम करे

*03:* मुल्क में फैल रही नफ़रत की सियासत पर लगाम लगाए, मज़हब के नाम पर दंगा फ़साद फैलाने वालों पर अब तो नकेल कसे। *कितने अफ़सोस की बात है कि ऐसे नाज़ुक हालात में भी कुछ लोग नफ़रत की सियासत कर रहे हैं, आज ही शाहीन बाग़ में कुछ लोगों ने प्रोटेस्ट करने वालों से मार पीट की, यहां तक कि पेट्रोल बम तक फेंका।*

आज ज़रूरत इस बात की है कि लोगों को प्यार दिया जाये, एक दूसरे को मदद फ़राहम की जाये, एक दूसरे को सहारा दिया जाये और मज़हब के नाम पर दिलों में पल रही अदावतों का ख़ातमा किया जाये ताकि इस अज़ाब इलाही से बचा जा सके। 

*हुकूमत को चाहिए कि लोगों तक ये पैग़ाम ज़रूर पहुंचाए कि वो अपने दिलों से नफ़रत के जज़बात निकाल कर दिलों को एक दूसरे के तईं मुहब्बत और दोस्ती के जज़बात से लबरेज़ करें और बिला तफ़रीक़ मज़हब-ओ-मिल्लत एक दूसरे का सहारा बनें।*

*04:* ख़बरें आ रही हैं कि महाराष्ट्र में कई इमामों और मसाजिद के अरकान कमेटी को गिरफ़्तार कर लिया गया है और उन पर एफ़ आई आर दर्ज की गई है, साथ ही नमाज़ियों को मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से रोका जा रहा है। *ख़ुदा के लिए ऐसा ना करें। इन इमामों और उन नमाज़ियों की दुआओं के ज़ेर-ए-असर ये बला टाली जा सकती है। ऐसे नाज़ुक हालात में इबादत-गाहों को आबाद किया जाता है ना कि वीरान। इसलिए जो लोग मसाजिद में जा कर इबादत करना चाहते हैं उन्हें रोका ना जाये, बस उन्हें एहतियाती तदाबीर इख़तियार करने की तलक़ीन की जाय और इस अहम काम के लिए मसाजिद के अइम्मा से काम लिया जाय।*

मसाजिद के इमामों की लोग क़दर करते हैं, उनकी बातों पर तवज्जा देते हैं और अमल की कोशिश करते हैं, इसलिए इस वबा की रोक-थाम के सिलसिले में ये इमाम बेहतर कारकर्दगी दिखा सकते हैं और उनसे अच्छी ख़ासी मदद ली जा सकती है। और ये तभी मुम्किन होगा जब लोग मस्जिद जाएं, इसलिए लोगों को मसाजिद की हाज़िरी से ना रोकना ही बेहतर होगा

*हमने जो बातें बयान की हैं माज़ी की तारीख़ भी उनकी तसदीक़ करती है। इससे पहले भी मोहलिक वबाएं नाज़िल हुई हैं लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ है कि मस्जिदों में ताले लगा दिए गए हो। इसलिए ऐसे हालात में सऊदी हुकूमत या किसी अरब कन्ट्री के तरीका-ए-कार को हमारे लिए रोल मॉडल नहीं बनाया जा सकता है। ये उनका अपना पर्सनल तरीका-ए-कार है और हम जो बता रहे हैं वो तारीख़ की रोशनी में बता रहे हैं।*

तारीख़ हमें ये भी बताती है कि इस तरह की बलाऐं उस वक़्त दूर हुईं जब लोगों ने अपने घरों को छोड़कर मस्जिदों की पनाह ले ली और अल्लाह की तरफ़ रुजू ले आए। इस लिहाज़ से भी लोगों को इबादत-गाहों से दूर करना मुनासिब इक़दाम नहीं हो सकता है

तारीख़ हमें ये भी बताती है कि ऐसे फ़ित्नों के दौर में लोगों को राहत उसी वक़्त मिली जब मज़लूमों की दाद रसी की गई, भूकों को खाना खिलाया गया, बे-सहारों को सहारा दिया गया और ज़रूरतमंदों की ज़रूरत पूरी की गई, इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि मुल्क के हर दुखी इन्सान का दुख दूर किया जाये और परेशान हाल की परेशानी का मुदावा किया जाये

अगर हम ऐसा करते हैं तो साबित हो जाएगा कि हम अपनी कोशिशों में सच्चे हैं और फिर इंशा-ए-अल्लाह आसमान से अल्लाह की नुसरत नाज़िल होगी, दुनिया अमन-ओ-अमान महसूस करेगी और इस हलाकत ख़ेज़ वबा से सबको नेजात हासिल होगी, इन शा-अल्लाह। 


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आदमी  है  तो  आदमी ही रह
आदमियत को दाग़दार न कर
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